बस ! अब बहुत हुआ … प्रकृति को इतना भी मत उजाड़िए कि महाविनाश हो जाए
वक्त काफी गुजर गया अब संभलिए ?
डाॅ0 रमेश खन्ना (वरि. पत्रकार)
भुज और उत्तरकाशी से कुछ नहीं समझे , केदारनाथ से कुछ नहीं समझे , अब नेपाल से भी कुछ न समझना ? चीन जैसा दुनिया का नंबर 1 दुश्मन दुनियाभर में कोरोना फैलाए या बाढ़ की सूचना 4 घंटे देर से दे , कुछ मत समझना । छलनी करते रहना पहाड़ों के सीनें ? बनाते रहना टिहरी जैसे विशाल बाँध , चढ़ाते रहना पहाड़ों पर रेलगाड़ी , सुरंगों की श्रृंखला ।
अपनी मर्जी कर तोड़ते रहना पहाड़ । सारी दुनिया को घेर लीजिए , इमारतों से भर दीजिए । छलनी कर डालिये धरती का सीना । न्यूजीलैंड का टनल हादसा हो या फिर सिल्क्यारा टनल की विनाशकारी दुर्घटना ; सब चलेगा , कुछ भी नहीं रुकेगा । अब वही दुश्मन चीन ब्रह्मपुत्र पर संसार का सबसे ऊंचा बांध बना रहा है । शिवालिक पर्वतमाला दरके या फिर हिमालय : अपनी बला से ?
अभी दो तीन दशक पूर्व की बात है जब ओज़ोन परत में छेद हो जाने की बात सामने आई थी । बताया गया कि एसी से निकलने वाली गैस इस छेद की सबसे बड़ी जिम्मेदार है । आग और जहर उगलते लाखों कारखाने भारी आकाशीय प्रदूषण के कारण है । पर क्या हुआ ? हटाया कोई ? समुद्र में मिलने वाली तमाम प्राकृत नदियां प्रदूषण से दम तोड़ रही हैं ।
क्या किया आपने ? या सरकारों ने ? या सफेद हाथी यूएनओ ने ? ये जितने गूगल जैसे बड़े बड़े संयंत्र स्थापित हो रहे हैं इन्हें ठंडा रखने के लिए टनों पेयजल चाहिए । तो करोड़ों टन पानी तो बड़े बड़े साइबर उपक्रमों के प्रोजेक्ट पी जाएंगे ? तब मनुष्य को कहां से मिलेगा पानी । तो क्या एक दिन ऐसा आयेगा जब भरी भरकम उद्योगों को ठंडा रखने के लिए मानव जाति का सारा पानी खर्च हो जाएगा ? और फिर सूख जाएगी धरती ?
मानव जाति ने कुदरत से छेड़खानी के नतीजे बार बार भुगते हैं । चीन द्वारा हड़पे गए तिब्बत से आई आपदा ने नेपाल को अभूतपूर्व दर्द दिए । अब से करीब 50 वर्ष पूर्व महान साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा का एक उपन्यास पढ़ा था । नाम था सामर्थ्य और सीमा । पानी की ऐसी ही विभीषिका पर लिखा गया उपन्यास । नेपाल में आज जो हुआ , 13 साल पहले केदारनाथ में जो हुआ था , हू ब हू वही था जिसका चित्रण भगवती बाबू ने अपने उपन्यास में किया था ।
वे समय को समय से पहले समझ लेने वाले लोग थे । अपनी कहानियों , कविताओं और उपन्यासों के जरिए चेतावनी देते थे । लेकिन मानव न कल समझा , न नेपाल से आज समझेगा और न आने वाले कल समझेगा । तिब्बत से नेपाल तक महात्रासदी हुई है । समय आ गया है मानवजाति को आश्रय देने वाली धरती बचाने का । बहुत देर हो गई , शुरुआत कीजिए । धरती इंसाफ मांग रही है । तो दीजिए , अन्यथा याद रखिए , नियति क्रूर है और भुगतते रहिये । नामों निशान मिट जाएगा ?

