हिंदी के ‘पाणिनी’ आचार्य किशोरीदास वाजपेयी: शब्द-शिल्पी और भाषा-मनीषी
हिंदी साहित्य और व्याकरण की दुनिया में आचार्य किशोरीदास वाजपेयी एक ऐसा स्तंभ हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्रभाषा को अनुशासन और वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उन्हें ‘हिंदी का पाणिनी’ कहा जाता है, क्योंकि जिस प्रकार महर्षि पाणिनी ने संस्कृत को व्याकरणबद्ध किया, उसी प्रकार वाजपेयी जी ने हिंदी की प्रकृति को समझकर उसका परिष्कार किया।
जन्म और प्रारंभिक जीवन: संघर्ष से सिद्धि तक
आचार्य वाजपेयी का जन्म बसंत पंचमी, सन् 1897 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में बिठूर के निकट रामनगर में हुआ था। उनके पिता पंडित सतीदीन वाजपेयी एक सरल हृदय ब्राह्मण थे। बचपन में उनका नाम गोविंद प्रसाद था, लेकिन वृंदावन में दीक्षा ग्रहण करने के बाद उनके गुरु ने उन्हें नया नाम ‘किशोरीदास’ दिया, जो कालांतर में हिंदी जगत का एक दैदीप्यमान नक्षत्र बना।
उनका प्रारंभिक जीवन अभावों और संघर्षों में बीता, लेकिन ज्ञान की पिपासा ने उन्हें कभी रुकने नहीं दिया। उन्होंने बनारस से ‘प्रथमा’ और पंजाब विश्वविद्यालय से ‘विशारद’ एवं ‘शास्त्री’ की परीक्षाएँ ससम्मान उत्तीर्ण कीं।
कर्मक्षेत्र: कनखल (हरिद्वार) साधना स्थली
अध्यापन और लेखन के प्रति उनका अनुराग ऐसा था कि शुरुआती छह वर्षों में उन्होंने सात स्कूल बदले। अंततः वे हरिद्वार के पावन क्षेत्र कनखल में बस गए। यहाँ उन्होंने लगभग 50 वर्षों तक भाषा के परिष्कार और अध्ययन-अध्यापन का ऐतिहासिक कार्य किया। वे केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जिन्होंने देश की आजादी और राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा के लिए निरंतर संघर्ष किया।
साहित्यिक योगदान: ३२ कालजयी कृतियाँ
आचार्य वाजपेयी का पहला लेख ‘दराधा भक्ति’ 1916 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं:
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हिंदी शब्दानुशासन: यह हिंदी व्याकरण का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है।
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भारतीय भाषा विज्ञान: भाषा की उत्पत्ति और विकास पर एक गंभीर विमर्श।
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बृजभाषा का व्याकरण: क्षेत्रीय भाषाओं के शास्त्रीय पक्ष को उजागर करती कृति।
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अन्य प्रमुख रचनाएँ: राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण, रस और अलंकार, संस्कृति का पांचवा अध्याय, हिंदी शब्द मीमांसा, हिंदी निरुक्त, अच्छी हिंदी, तरंगिणी काव्य और सुदामा नाटक।
कुल 32 पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने हिंदी के स्वरूप को निखारा और उसे अन्य भारतीय भाषाओं के समकक्ष मजबूती से खड़ा किया।
प्रतिभा का अनावरण और सम्मान
कनखल, हरिद्वार में उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए भारतीय संवाद परिषद द्वारा उनकी भव्य प्रतिमा स्थापित की गई। इस प्रतिमा का अनावरण उनके 95वें जन्म दिवस (8 फरवरी 1992) के अवसर पर यशस्वी पत्रकार अक्षय कुमार जैन के कर-कमलों द्वारा संपन्न हुआ।
इस पुनीत कार्य में देवेंद्र स्वरूप ब्रह्मचारी (मूर्ति प्रदाता), म०म० स्वामी संतोषी माता, प्रेरक हरदेव सिंह (अपर मेलाधिकारी 1992) और मूर्तिकार फकीर चरण परीडा (ओडिशा) का विशेष योगदान रहा।
11 अगस्त 1981 को हिंदी का यह महाप्राण साधक पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन अपनी कृतियों के माध्यम से वे आज भी हर हिंदी प्रेमी के हृदय में जीवित हैं। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि हिंदी भाषा के संस्कार और अस्मिता का दूसरा नाम हैं।
आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ने उस समय हिंदी व्याकरण पर कार्य करना शुरू किया जब हिंदी को या तो संस्कृत के चश्मे से देखा जाता था या अंग्रेजी व्याकरण के सांचे में ढालने की कोशिश की जाती थी। उन्होंने इन दोनों प्रवृत्तियों से हटकर हिंदी की ‘प्रकृति’ को पहचाना।
1. संस्कृत और अंग्रेजी के बंधनों से मुक्ति
वाजपेयी जी का मानना था कि हिंदी संस्कृत की बेटी जरूर है, लेकिन वह अब एक स्वतंत्र और वयस्क भाषा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी के अपने नियम हैं (जैसे—लिंग विधान और क्रिया का स्वरूप), जो उसे संस्कृत से अलग करते हैं। उन्होंने हिंदी को “संस्कृत की बैसाखियों” से मुक्त कराया।
2. ‘हिंदी शब्दानुशासन’: एक युगांतरकारी ग्रंथ
इस ग्रंथ को हिंदी व्याकरण का ‘संविधान’ कहा जा सकता है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
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वैज्ञानिक पद्धति: उन्होंने शब्दों की व्युत्पत्ति और प्रयोग के पीछे तर्क दिए।
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सरलीकरण: उन्होंने जटिल व्याकरणिक नियमों को सरल बनाया ताकि वे आम बोलचाल और लेखन में सहायक हो सकें।
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विभक्तियों का विवेचन: उन्होंने हिंदी की कारक-विभक्तियों (ने, को, से, के लिए आदि) पर मौलिक विचार प्रस्तुत किए और बताया कि ये संस्कृत के प्रत्ययों से किस प्रकार भिन्न हैं।
3. ‘अच्छी हिंदी’ का मानक
वाजपेयी जी केवल व्याकरण ही नहीं सिखाते थे, बल्कि वे “अच्छी हिंदी” के पक्षधर थे। उन्होंने भाषा की शुद्धता और उसके प्रवाह (Flow) के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया। उनका तर्क था कि व्याकरण को भाषा पर बोझ नहीं, बल्कि उसकी सुंदरता बढ़ाने वाला आभूषण होना चाहिए।
4. राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का वैज्ञानिक आधार
उन्होंने यह सिद्ध किया कि हिंदी में वह सामर्थ्य है कि वह वैज्ञानिक, कानूनी और प्रशासनिक शब्दावली को आत्मसात कर सके। ‘भारतीय भाषा विज्ञान’ के माध्यम से उन्होंने हिंदी को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ जोड़कर एक व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान किया।
आचार्य वाजपेयी ने ‘शब्दानुशासन’ लिखकर हिंदी को एक ‘सिस्टम’ दिया। यदि आज हम हिंदी को एक व्यवस्थित और मानक भाषा के रूप में देखते हैं, तो इसका बहुत बड़ा श्रेय उनकी कठोर साधना को जाता है।

