Sunday, February 8, 2026
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त्रिलोक चन्द्र भट्ट : कलम, संघर्ष और साहस का संगम

उत्तराखंड की धरती ने कई ऐसे लाल पैदा किए हैं जिन्होंने अपनी लेखनी और कर्मठता से समाज को नई दिशा दी है। उन्हीं में से एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं- त्रिलोक चन्द्र भट्ट ! वे केवल एक वरिष्ठ पत्रकार या साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक सजग आंदोलनकारी, साहसी ट्रेकर और पत्रकारों के हितों के संरक्षक होने के साथ उत्तराखंड की चेतना, संघर्ष और संस्कृति के जीवंत प्रतीक हैं।  वे एक वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी होने के साथ-साथ प्रखर पत्रकार, संवेदनशील साहित्यकार और समर्पित पर्यावरण प्रेमी भी हैं।  उनकी जीवन यात्रा पहाड़ के उस ऊबड़-खाबड़ रास्ते की तरह है, जहाँ हर मोड़ पर संघर्ष है, लेकिन हर चोटी पर एक नई दृष्टि है।

उत्तराखंड के सार्वजनिक जीवन में त्रिलोक चन्द्र भट्ट एक ऐसा नाम है, जो बौद्धिक विमर्श और धरातलीय संघर्ष-दोनों मोर्चों पर समान रूप से सक्रिय रहा है। एक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार और संपादक के रूप में उन्होंने न केवल समाज को आइना दिखाया, बल्कि पृथक राज्य आंदोलन में अपनी सक्रिय भूमिका से इतिहास की रचना भी की।

  1. कलम और क्रांति का संगम

भट्ट जी की लेखनी केवल कागजों पर नहीं चली, बल्कि वह उत्तराखंड की सड़कों पर हुए राज्य आंदोलन की गवाह बनी। उनकी कालजयी कृति ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का इतिहास’ महज़ एक किताब नहीं, बल्कि उन शहीदों और आंदोलनकारियों को दी गई एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपने खून से इस राज्य की नींव रखी।  उनकी लेखनी में जो सबसे गहरा दर्द और आक्रोश झलकता है, वह है “मुजफ्फरनगर (रामपुर तिराहा) कांड”। एक राज्य आंदोलनकारी और पत्रकार के रूप में उन्होंने इस घटना को केवल कवर नहीं किया, बल्कि उसे उत्तराखंड के इतिहास के “सबसे काले अध्याय” के रूप में अपनी पुस्तकों में दर्ज किया है। एक संपादक के रूप में उन्होंने “तरुण हिमालय बुलेटिन” और “उत्तर पथ” के माध्यम से सदैव उस निर्भीक पत्रकारिता का पक्ष लिया, जो सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों से तीखे सवाल पूछने का हौसला रखती है।

  1. राज्य निर्माण के सजग प्रहरी

त्रिलोक चन्द्र भट्ट जी ने उत्तराखंड राज्य प्राप्ति के संघर्ष में एक अग्रणी राज्य आंदोलनकारी की भूमिका निभाई। जब पृथक राज्य की मांग अपने चरम पर थी, तब उन्होंने न केवल सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया, बल्कि अपनी लेखनी के माध्यम से जन-मानस को लामबंद करने का कार्य भी किया। उनकी वैचारिक स्पष्टता ने इस आंदोलन को एक बौद्धिक आधार प्रदान किया।

  1. राज्य आंदोलन के “वैचारिक सूत्रधार”  1994 के दौर में जब उत्तराखंड राज्य आंदोलन उफान पर था, तब भट्ट जी ने पुलिस की प्रताड़ता, लाठियां और गिरफ्तारियां भी झेलीं । वे उन गिने-चुने आंदोलनकारियों में से हैं जो आज भी राज्य की मूल अवधारणा (जल, जंगल, जमीन) को बचाने की वकालत करते हैं।
  2. पृथक राज्य आंदोलन के ऐतिहासिक दस्तावेजी

त्रिलोक चन्द्र भट्ट उन गिने-चुने लेखकों में से हैं, जिन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन की लौ को अपनी लेखनी से जीवंत रखा। उनकी पुस्तकें, जैसे ‘उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास’ और ‘राज्य आंदोलन का नवीन इतिहास’, इस क्षेत्र के संघर्षों का प्रामाणिक और ऐतिहासिक दस्तावेज मानी जाती हैं।

ऐतिहासिक दस्तावेज : ‘‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का इतिहास’

त्रिलोक चन्द्र भट्ट जी की यह पुस्तक केवल एक संकलन नहीं, बल्कि उन संघर्षों की जीवंत गवाही है जिसने एक नए राज्य को जन्म दिया। इस पुस्तक के कुछ प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं-

तथ्यात्मक प्रमाणिकता : भट्ट जी स्वयं आंदोलनकारी रहे हैं, इसलिए उन्होंने इस पुस्तक में सरकारी उपेक्षा, पुलिसिया बर्बरता (मुजफ्फरनगर कांड, खटीमा और मसूरी गोलीकांड) और जनता के आक्रोश को बहुत करीब से और प्रमाणिक तथ्यों के साथ दर्ज किया है।

आंदोलन के विविध आयाम : उन्होंने केवल राजनीतिक घटनाक्रम को ही नहीं, बल्कि इसमें महिलाओं की भूमिका, छात्रों का योगदान और लोक कलाकारों द्वारा जगाई गई चेतना को भी प्रमुखता दी है।

भविष्य के लिए संदर्भ : यह पुस्तक आज के शोधार्थियों के लिए एक बुनियादी स्रोत सामग्री की तरह काम करती है, जो यह समझने में मदद करती है कि राज्य की अवधारणा के पीछे के वास्तविक मुद्दे क्या थे।

त्रिलोक चन्द्र भट्ट जी की लेखनी में जो सबसे गहरा दर्द और आक्रोश झलकता है, वह है ‘‘मुजफ्फरनगर (रामपुर तिराहा) कांड’’। एक राज्य आंदोलनकारी और पत्रकार के रूप में उन्होंने इस घटना को केवल कवर नहीं किया, बल्कि उसे उत्तराखंड के इतिहास के ‘‘सबसे काले अध्याय’’  के रूप में अपनी पुस्तकों में दर्ज किया है।

यहाँ उनके द्वारा वर्णित कुछ विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भ और उनके साहसिक पहलुओं का विस्तृत विवरण है-

रामपुर तिराहा कांड : कलम के जरिए न्याय की पुकार

अपनी पुस्तक ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का इतिहास’ में भट्ट जी ने इस घटना का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण दिया है-

लोकतंत्र की हत्या : उन्होंने लिखा है कि किस तरह शांतिपूर्ण तरीके से दिल्ली जा रहे निहत्थे आंदोलनकारियों को रात के अंधेरे में घेरकर उन पर जुल्म किए गए। उन्होंने इसे ष्आजाद भारत का जलियांवाला बागष् करार दिया।

महिलाओं का अपमान : एक संवेदनशील लेखक के रूप में उन्होंने उन महिलाओं की पीड़ा को शब्द दिए, जिनके साथ उस रात बर्बरता हुई थी। भट्ट जी ने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि उत्तराखंड राज्य की नींव में उन माताओं-बहनों का बलिदान सबसे ऊपर है।

दस्तावेजीकरण की शक्ति : उन्होंने उन अधिकारियों और राजनेताओं के चेहरों को अपनी लेखनी के माध्यम से उजागर किया, जो इस कांड के लिए जिम्मेदार थे, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि यह राज्य “खैरात” में नहीं, बल्कि “खून” से सींचकर मिला है।

  1. हिंदी और राजभाषा के प्रति समर्पण

उनकी पुस्तक ‘राजभाषा हिंदी के बढ़ते कदम’ केवल भाषा के बारे में नहीं है, बल्कि यह उनके इस विश्वास को दर्शाती है कि बिना अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के, कोई भी समाज अपनी पहचान नहीं बचा सकता। ‘राजभाषा हिंदी के बढ़ते कदम’ और ‘उत्तरांचल के अनमोल मोती’ जैसी कृतियों के माध्यम से उन्होंने हिंदी भाषा और क्षेत्रीय गौरव को वैश्विक पटल पर रखा है। वे अपनी पत्रिकाओं (तरुण हिमालय बुलेटिन और उत्तर पथ) में शुद्ध और सरल हिंदी के हिमायती हैं। उन्होंने हमेशा इस बात का विरोध किया कि सरकारी कामकाज में जटिल अंग्रेजी का प्रयोग कर आम आदमी को व्यवस्था से दूर रखा जाता है।

  1. पत्रकारिता और साहित्य का संगम

एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में भट्ट जी ने सदैव निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता को प्राथमिकता दी। उन्होंने क्षेत्रीय समस्याओं को राष्ट्रीय पटल पर लाने का सराहनीय कार्य किया है। वहीं, एक साहित्यकार के रूप में उनकी रचनाओं में पहाड़ की पीड़ा, यहाँ की लोक संस्कृति और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम झलकता है। उनके शब्द केवल कागज़ पर उकेरी गई स्याही नहीं, बल्कि समाज का दर्पण हैं।

  1. संपादन : वर्ष 2004 से साप्ताहिक“तरुण हिमालय बुलेटिन” और 2016 से मासिक पत्रिका “उत्तर पथ पथ”  का संपादन कर वे निर्भीक पत्रकारिता की मशाल जलाए हुए हैं। उन्होंने हिंदी दैनिक उत्तराखण्ड प्रहरी का भी प्रकाशन किया और कुछ वर्षों तक उसके संपादक भी रहे हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने कई स्मृति ग्रंथों, स्मारिकाओं और अन्य पत्रिकाओं का भी कुशल संपादन किया है।
  2. संगठन शक्ति

भट्ट जी केवल समाचार लिखने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने पत्रकारिता के गिरते मूल्यों को बचाने और मीडियाकर्मियों के हक की आवाज बुलंद करने के लिए उत्तराखंड में ‘नेशनलिस्ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स’ (NUJ उत्तराखंड) की स्थापना की। संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने राज्यभर के पत्रकारों को एक मंच पर लाने का अभूतपूर्व कार्य किया।

  1. पर्यावरण संरक्षण और ट्रैकिंग के प्रति जुनून

हिमालय के प्रति उनका प्रेम केवल शब्दों तक सीमित नहीं है। एक पर्यावरण प्रेमी के तौर पर वे लगातार पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए सक्रिय रहते हैं। भट्ट जी एक कुशल ट्रेकर भी हैं, जिन्होंने हिमालय की दुर्गम चोटियों, ग्लेशियरों और बुग्यालों को नापा है। उनकी यह साहसिक प्रवृत्ति उन्हें प्रकृति के और करीब ले जाती है, जिससे वे हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण को बेहतर ढंग से समझ और समझा पाते हैं।

  1. हिमालयी पर्यावरण और पदयात्राएँ : एक अनुभवी ट्रेकर होने के नाते, उन्होंने हिमालय के उन दूरस्थ क्षेत्रों की यात्रा की जहाँ सामान्यतः लोग नहीं पहुँच पाते। इन यात्राओं का उद्देश्य केवल पर्यटन नहीं, बल्कि पर्यावरण ऑडिट करना भी रहा। उन्होंने बुग्यालों के संरक्षण और ग्लेशियरों के पिघलने की समस्या को प्रमुखता से उठाया।
  2. साहसी ट्रेकर : हिमालय की चोटियों से संवाद

भट्ट जी का व्यक्तित्व केवल बंद कमरों या प्रेस क्लबों तक सीमित नहीं रहा। एक शौकिया ट्रेकर के रूप में हिमालय की दुर्गम घाटियों से उनका अटूट प्रेम रहा है। वर्ष 2004 की सुंदरढूंगा वैली की वह हृदयविदारक घटना, जिसमें उन्होंने अपने पाँच साथियों को खो दिया, किसी भी व्यक्ति को तोड़ सकती थी। लेकिन स्वयं गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, उन्होंने जिस तरह ITBP के साथ मिलकर रेस्क्यू ऑपरेशन में भूमिका निभाई, वह उनके अदम्य साहस और ‘मानवता प्रथम’ के संकल्प को दर्शाता है। भट्ट जी के लिए ट्रेकिंग केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हिमालय को समझने और उसकी पीड़ा को महसूस करने का एक तरीका रहा है।

  1. सुंदरढूंगा वैली (2004) का वो भयावह मंजर

त्रिलोक चन्द्र भट्ट के व्यक्तित्व का एक पक्ष बेहद साहसी ट्रेकर का भी है। हिमालय की दुर्गम चोटियों से उनका गहरा लगाव रहा है, उन्होंने सुन्दरढूंगा, पिंडारी, कफनी आदि ग्लेशियरों सहित मध्य हिमालय के कई अनछुए दुर्गम क्षेत्रों की साहसिक यात्राएं की। । उनके लेखों में इन क्षेत्रों की वनस्पति, लुप्त होती जड़ी-बूटियों और ग्लेशियरों के पिघलने का दर्द साफ झलकता है। लेकिन वर्ष 2004 का सुंदरढूंगा वैली का अभियान उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा लेकर आया। वह उनके जीवन का सबसे टर्निंग पॉइंट था।

घटना का विवरण : 9 जून, 2004 के उस अभियान में सुंदरढूंगा वैली में भारी हिमपात और भूस्खलन के कारण “सुखराम केव” में तबाही मची थी। इस हादसे में उनके साथ मौजूद रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के पांच साथियों ने अपने प्राण गंवा दिए। लेकिन साथियों की मौत और स्वयं गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद भट्ट जी ने धैर्य नहीं खोया और घायलावस्था में अभियान दल का नेतृत्व संभाला। मौत को करीब से देखने के बावजूद, उनका हौसला नहीं टूटा। उन्होंने अपनी चोटों की परवाह किए बिना ITBP (भारत-तिब्बत सीमा पुलिस) के बचाव एवं राहत दल के साथ मिलकर रेस्क्यू ऑपरेशन में सक्रिय रूप से भाग लिया। यह घटना उनके फौलादी इरादों और दूसरों की सेवा के प्रति उनके समर्पण का जीवंत प्रमाण है।

ITBP का मददगार हाथ : बचाव दल को उस समय सटीक भौगोलिक ज्ञान की जरूरत थी। भट्ट जी ने अपनी चोटों को दबाकर नक्शे और रास्तों को समझने में टीम की मदद की। घायलावस्था में ही वे आईटीबीपी के बचाव एवं राहत दल के साथ दुर्घटनास्थल पर पहुंचे और मलवे में दबे मृतकों के शवों की सटीम जानकारी देकर शव बरामद करवाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी इस बहादुरी ने यह साबित किया कि एक पत्रकार केवल “कलम का सिपाही” ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर “मैदान का सिपाही” भी होता है।

अदम्य साहस : जब RAF के पांच जवान शहीद हुए, तब भट्ट जी खुद गंभीर चोटों से जूझ रहे थे। लेकिन एक पत्रकार और एक पहाड़ी होने के नाते, उन्होंने अपने दर्द को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने ITBP को उन गुप्त रास्तों और भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी दी, जो रेस्क्यू के लिए महत्वपूर्ण थे। इस बचाव अभियान में वे ही आईटीबीपी के मार्गदर्शक बने।

लेखनी में प्रभाव : : इस घटना के बाद उन्होंने हिमालय की सुरक्षा और वहां जाने वाले दलों के लिए सुरक्षा मानकों पर कई प्रभावशाली लेख लिखे, ताकि भविष्य में ऐसी जान-माल की हानि न हो।

  1. समाजसेवा : कर्म ही पूजा है

एक समाजसेवी के रूप में त्रिलोक चन्द्र भट्ट जी सदैव चिकित्सा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे जन-सरोकारों से जुड़े रहे हैं। समाज के वंचित वर्गों की मदद करना हो या क्षेत्रीय विकास के लिए नीतिगत संघर्ष, उन्होंने सदैव ‘‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई” के सिद्धांत का पालन किया है। उनकी सादगी और मिलनसार व्यक्तित्व उन्हें आम जनमानस में बेहद लोकप्रिय बनाता है।

  1. पर्यावरण प्रेम और सामाजिक सरोकार

एक पर्यावरण प्रेमी और समाजसेवी के रूप में वे हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने के लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख अक्सर ज्वलंत सामाजिक मुद्दों और पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित होते हैं, जो पाठकों को गहराई से सोचने पर मजबूर करते हैं।

विशिष्ट उपलब्धियाँ और महत्वपूर्ण योगदान

  1. साहित्य एवं कृतियाँ :भट्ट जी की लेखनी में उत्तराखंड की सोंधी माटी की महक और यहाँ की चुनौतियाँ साफ दिखती हैं। उनकी प्रमुख पहचान उनके संस्मरणों और समसामयिक विषयों पर लिखे गए लेखों से है। उन्होंने विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों की लोक संस्कृति, लुप्त होती परंपराओं और पलायन जैसे गंभीर विषयों पर अपनी पुस्तकों और लेखों के माध्यम से समाज का ध्यान खींचा है।
  2. पत्रकारिता में “धरातल” की आवाज़ :एक पत्रकार के रूप में उन्होंने केवल खबरों को रिपोर्ट नहीं किया, बल्कि उनका विश्लेषण किया। उन्होंने उत्तराखंड के कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए कार्य करते हुए“खोजी पत्रकारिता” को बढ़ावा दिया। उन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध और जन-सुविधाओं के अभाव पर जो लेख शृंखलाएं लिखीं, उनका शासन-प्रशासन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
  3. पत्रकारों के रक्षक और मार्गदर्शक

पत्रकारिता आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें पत्रकारों के हितों की रक्षा करना एक बड़ी चुनौती है। नेशनलिस्ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (NUJ उत्तराखण्ड) के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने राज्य के मीडियाकर्मियों को एक वैचारिक मंच और सुरक्षा कवच प्रदान किया। उन्होंने सिखाया कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक जवाबदेही है।

  1. नेशनलिस्ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (NUJ) : एक सुरक्षा कवच

भट्ट जी ने महसूस किया कि राज्य के दूरदराज इलाकों (जैसे धारचूला, मुनस्यारी, उत्तरकाशी) में काम करने वाले पत्रकारों को अक्सर डराया-धमकाया जाता है।

संगठन का उद्देश्य : उन्होंने NUJ की नींव इसलिए रखी ताकि सत्ता और माफिया के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को अकेला न महसूस हो।

राज्य स्तरीय पहचान : उनके नेतृत्व में ही इस संस्था ने राज्य सरकार से पत्रकारों के कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण माँगें मनवाईं।

पत्रकारिता का वैचारिक मंच : ‘उत्तर पथ’ (हिंदी मासिक)

वर्ष 2016 से निरंतर प्रकाशित हो रही यह पत्रिका नेशनलिस्ट यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (NUJ) की वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसके संपादन के माध्यम से भट्ट जी ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं-

पत्रकार सुरक्षा और हित : ‘उत्तर पथ’ के माध्यम से वे ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में काम करने वाले उन पत्रकारों की समस्याओं को उठाते हैं जिनकी आवाज अक्सर मुख्यधारा के मीडिया में दब जाती है।

सांस्कृतिक एवं सामाजिक सरोकार : पत्रिका केवल समाचारों तक सीमित नहीं है; इसमें उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण, हिमालयी राज्यों की चुनौतियां और हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार पर विशेष शोधपरक लेख प्रकाशित होते हैं।

राष्ट्रवादी दृष्टिकोण : नाम के अनुरूप ही यह पत्रिका पत्रकारिता में ‘‘राष्ट्र प्रथम’’ और ‘‘सत्य के प्रति आग्रह’’ के मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास करती है।

  1. ‘तरुण हिमालय बुलेटिन’दो दशकों का सफर

साप्ताहिक ‘तरुण हिमालय बुलेटिन’ (2004 से) के माध्यम से उन्होंने स्थानीय जन-समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम बनाया है। एक छोटे समाचार पत्र को दो दशकों तक निरंतर और निष्पक्षता के साथ संचालित करना उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को दर्शाता है।

सम्मान एवं पहचान

उनकी इन्हीं बहुआयामी सेवाओं के लिए उन्हें विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर सम्मानित किया जा चुका है-

राज्य आंदोलनकारी सम्मान : उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य निर्माण में उनके अतुलनीय योगदान के लिए।

साहित्यिक एवं पत्रकारिता पुरस्कार : विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा उनकी निर्भीक लेखनी और समाज सेवा के लिए।

प्रेरणा का स्रोत

त्रिलोक चन्द्र भट्ट जी का व्यक्तित्व हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने सिद्ध किया है कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो एक व्यक्ति पत्रकारिता, साहित्य और सक्रिय आंदोलन के माध्यम से समाज में बड़ा सकारात्मक बदलाव ला सकता है। उत्तराखंड के गौरवशाली इतिहास और उज्जवल भविष्य के बीच वे एक मजबूत सेतु की तरह खड़े हैं।  उनका जीवन नई पीढ़ी के पत्रकारों और लेखकों के लिए एक प्रेरणापुंज है। वे सिखाते हैं कि एक पत्रकार का धर्म केवल सूचना देना नहीं, बल्कि समाज के प्रति जवाबदेह होना और कठिन परिस्थितियों में भी मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखना है। उत्तराखंड की मिट्टी के इस सपूत ने अपनी लेखनी और कर्मों से राज्य को जो पहचान दी है, वह अविस्मरणीय है। उनको केवल एक लेखक मानना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। वे एक ‘‘इतिहासकार’’ हैं जो इतिहास को घटते हुए देख रहे हैं, एक ‘‘सैनिक’’ हैं जो आपदा में अपनों के लिए लड़ रहे हैं, और एक ‘‘संपादक’’ हैं जो समाज की नब्ज पर हाथ रखे हुए हैं। भट्ट जी का जीवन हमें सिखाता है कि ‘‘लेखनी तभी सार्थक है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति के संघर्ष में काम आए।’’ चाहे सुंदरढूंगा वैली में अपनी जान की परवाह न करते हुए दूसरों की मदद करना हो, या कलम के जरिए पत्रकारों के अधिकारों की लड़ाई लड़नाकृवे सही मायने में एक ‘‘कर्मयोगी’’ पत्रकार हैं।

एक प्रेरणादायी विरासत

साहित्य, पर्यावरण, समाजसेवा और साहसिक पर्यटन—इन सभी क्षेत्रों में भट्ट जी का योगदान नई पीढ़ी के लिए एक प्रेरणापुंज है। उनकी लेखनी में जहाँ एक ओर ‘राजभाषा हिंदी’ के प्रति प्रेम झलकता है, वहीं दूसरी ओर ‘उत्तरांचल के अनमोल मोतियों’ को सहेजने की तड़प भी दिखाई देती है।

आज के इस दौर में, जब पत्रकारिता के मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं, त्रिलोक चन्द्र भट्ट जैसे व्यक्तित्व यह भरोसा दिलाते हैं कि यदि इरादे फौलादी हों और कलम में सच्चाई हो, तो समाज को सही दिशा दी जा सकती है। उत्तराखंड को अपने इस सपूत की कर्मठता और लेखनी पर गर्व है।

मार्गदर्शक का व्यक्तित्व : त्रिलोक चन्द्र भट्ट जी आज की युवा पीढ़ी के लिए एक ‘‘जीवंत लाइब्रेरी’’ की तरह हैं। चाहे वह हिमालय के भूगोल की जानकारी हो, उत्तराखंड का राजनैतिक इतिहास हो या पत्रकारिता के नैतिक मूल्य, भट्ट जी से मिलने वाला हर व्यक्ति कुछ न कुछ नया सीखकर ही लौटता है। ‘‘हिमालय सा अडिग संकल्प और गंगा सी निर्मल लेखनी ही त्रिलोक चन्द्र भट्ट जी की असली पहचान है।’’ उनकी पूरी जीवन यात्रा का निचोड़ यह है कि ‘‘साहस और सत्य के बिना पत्रकारिता संभव नहीं है।’’ चाहे वह हिमालय की बर्फीली चोटियां हों या सत्ता के गलियारे, भट्ट जी ने हमेशा अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखी है।

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