Saturday, October 10, 2026
Uttarakhand

परमार्थ निकेतन में सत्संग शिविर का आयोजन

*💥परमार्थ निकेतन में सत्संग शिविर का आयोजन*

*✨गुजरात से गंगा पहुँचे श्रद्धालुओं ने परमार्थ गंगा तट पर किया संस्कार, संस्कृति, साधना और सनातन जीवनमूल्यों का आत्मबोध*

“💥*संस्कार वह विरासत हैं जो पीढ़ियों को जड़ों से जोड़ते हैं, संस्कृति वह चेतना है जो समाज को दिशा देती है और सत्संग वह सेतु है जो हमें स्वयं से, समाज को अपनी आत्मा से और भविष्य को अपने मूल्यों से जोड़ता है”*

*🙏🏿स्वामी चिदानन्द सरस्वती*

ऋषिकेश, 9 अक्टूबर। माँ गंगा के पावन तट,परमार्थ निकेतन में स्वामी नारायण गुरुकुल, अहमदाबाद एवं गुजरात से बड़ी संख्या में आए श्रद्धालुओं के लिए सत्संग शिविर का आयोजन किया गया। आध्यात्मिक वातावरण, गंगा की निर्मल धारा, मंत्रों की दिव्य अनुगूँज और सनातन संस्कृति के जीवनदायी संदेशों के बीच आयोजित इस शिविर में श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति के साथ जीवन के मूल प्रश्नों पर चिंतन करने का अवसर प्राप्त हुआ साथ ही, उन्होंने जाना कि हमारी जड़ें क्या हैं, हमारी संस्कृति हमें क्या देती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कैसी दुनिया छोड़कर जाना चाहते हैं?

परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी आध्यात्मिक चेतना, उसके संस्कारों और उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में निहित है। भारत ने विश्व को ज्ञान, परंपराएँ, जीवन को देखने की दृष्टि दी है।

स्वामी जी ने कहा कि आज आवश्यकता केवल शिक्षित पीढ़ी तैयार करने की नहीं, बल्कि ऐसी संस्कारित, संवेदनशील, विवेकशील और उत्तरदायी पीढ़ी के निर्माण की है, जो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में दक्ष होने के साथ अपनी जड़ों से भी गहराई से जुड़ी रहे। जिस शिक्षा में ज्ञान हो, पर करुणा न हो, जिसमें सफलता हो, पर संवेदना न हो, जिसमें तकनीक हो, पर नैतिकता न हो, वह शिक्षा अधूरी है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल आजीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाना, समाज के प्रति उत्तरदायित्व जगाना और मानवता के प्रति समर्पण का भाव विकसित करना है।

उन्होंने कहा कि गुरुकुल परंपरा भारत की उस विलक्षण दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें शिक्षा का अर्थ संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण है। ज्ञान के साथ विनय, सामर्थ्य के साथ सेवा, अधिकारों के साथ कर्तव्य और प्रगति के साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, यही वह संतुलन है जो व्यक्ति को योग्य नागरिक और समाज को सशक्त राष्ट्र बनाता है।

श्री संतवल्लभ दास जी स्वामी के श्री मुख से गंगा तट पर आयोजित यह सत्संग शिविर इसी शाश्वत संवाद का अवसर है, जहाँ परंपरा और भविष्य एक-दूसरे के सामने नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक बनकर उपस्थित हुए। माँ गंगा की अविरल धारा मानो यह संदेश दे रही थी कि जीवन का सौंदर्य ठहराव में नहीं, बल्कि अपनी मूल पहचान को सुरक्षित रखते हुए निरंतर प्रवाहित होने में है। जिस प्रकार गंगा अनेक धाराओं, प्रदेशों और संस्कृतियों को जोड़ती हुई आगे बढ़ती हैं, उसी प्रकार सनातन संस्कृति विविधताओं को आत्मसात करते हुए एकात्मता का मार्ग प्रशस्त करती है।

 

स्वामी जी ने पर्यावरण संरक्षण और जीवनशैली में भारतीय मूल्यों की भूमिका पर भी बल देते हुए कहा कि प्रकृति हमारे उपभोग की वस्तु नहीं, हमारे अस्तित्व का आधार है।

उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुये कहा कि सत्संग की अनुभूति को आश्रम की सीमाओं तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने घरों, परिवारों, शिक्षण संस्थानों और समाज तक लेकर जाएँ। बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ना न सिखाएँ, बल्कि सहानुभूति, अनुशासन, सत्यनिष्ठा और सेवा का महत्त्व भी समझाएँ। सफलता का उत्सव मनाएँ, लेकिन उसके साथ विनम्रता को भी जीवित रखें। तकनीक का उपयोग करें, लेकिन अपने विवेक को तकनीक के अधीन न होने दें। अपनी परंपराओं पर गर्व करें, लेकिन उस गर्व को समावेशिता, करुणा और विश्वबंधुत्व से भी जोड़ें।


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